मुंबई का वही स्टेशन… वही शाम… बस, साल बदल गए थे।

तुषार को इस शहर से प्रेम नहीं था, लेकिन किसी समय ये शहर प्रिया का पता हुआ करता था। पाँच साल पहले, इसी शहर ने दो दिलों को एक-दूसरे में डूबने का मौका दिया था… और फिर एक चुपचाप बिछड़ने का बहाना भी।

अब तुषार एक कॉरपोरेट कंपनी में सीनियर मैनेजर बन चुका था। शहर लौटने की ज़रूरत पेश आई, और जाने क्यों, उसने उसी होटल में कमरा लिया जहाँ कभी वो और प्रिया अपनी बारिश की कहानियों को सुनाते-सुनते रातें बिताते थे।

उस शाम, होटल के कॉफ़ी लाउंज में जब तुषार किताब पढ़ रहा था, एक जानी-पहचानी खुशबू हवा में घुली — लैवेंडर और हल्की सी मिट्टी की सौंधी गंध। उसने अनायास नजर उठाई… और समय वहीं रुक गया।

प्रिया सामने खड़ी थी — हल्के नीले कुर्ते में, आँखों में वही गहराई, और होंठों पर वही मुस्कान जो तुषार को आज भी तन्हाई में याद आ जाती थी।

“तुषार?” उसने धीरे से कहा।

“प्रिया… तुम?” तुषार की आवाज़ में नमी थी।

वो दोनों एक टेबल पर आकर बैठ गए। चुप्पियाँ बोलने लगीं, और आँखों ने वो सब बयां कर दिया जिसे लफ्ज़ कहने से डरते थे।

“काफी साल हो गए,” प्रिया ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा।

“पाँच साल, तीन महीने और ग्यारह दिन,” तुषार ने बिना हिचक के कहा।

प्रिया थोड़ी चौंकी, मुस्कुराई… “अब भी गिनते हो?”

“जो अधूरा रह जाता है, वो भूला नहीं जाता,” तुषार की आवाज़ धीमी थी।

तुषार और प्रिया की मुलाकात एक वर्कशॉप में हुई थी। प्रिया एक फ्रीलांस राइटर थी, और तुषार एक मार्केटिंग हेड। उनका मिलना पहले काम की वजह से था, लेकिन कुछ मुलाकातें इतनी खास होती हैं कि उनमें वक्त, जगह या कारण मायने नहीं रखते।

बारिशों का मौसम था। मुंबई की सड़कों पर जब पानी बहता था, तुषार और प्रिया बांद्रा की गलियों में हाथ थामे घूमते थे। घंटों बातें करते थे — किताबों, फिल्म्स, बचपन, डर, और उन सपनों की जो अधूरे थे।

एक शाम, जुहू की रेत पर चलते-चलते तुषार ने कहा था —
“काश, ये रात कभी खत्म न हो।”

प्रिया ने तब जवाब दिया था —
“रातें खत्म होती हैं, लेकिन यादें नहीं।”

फिर एक दिन, प्रिया को दिल्ली जाना पड़ा। माँ बीमार थीं। तुषार उसे रोकना चाहता था, लेकिन कह नहीं पाया। उसने प्रिया को समय देने की बात कही, और वो समय कब सालों में बदल गया, कोई नहीं जान पाया।

“मैंने कई बार कॉल करने की कोशिश की,” प्रिया ने कहा।

“मैंने नंबर बदल लिया था,” तुषार ने सिर झुका लिया।

“तुमने कभी माफ नहीं किया मुझे?”

“तुमने कभी माफ़ी मांगी?”
प्रिया चुप हो गई।

“मैं डरी हुई थी तुषार… एक माँ की बेटी और एक प्रेमिका के बीच फँसी हुई। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे निभाऊँ।” उसकी आँखें भीग गईं।

तुषार ने उसके हाथ पर हाथ रखा — वही स्पर्श, वही गर्माहट।

“और अब?” तुषार ने पूछा।

“अब… अब मैं लौट आई हूँ। माँ अब नहीं रहीं। मेरी कहानियाँ तो बच गईं, पर उनमें वो किरदार नहीं रहा जो तुम थे।”

वो रात होटल की बालकनी में बैठकर बीती — पुराने किस्सों को दोहराते, नई चुप्पियों को महसूस करते। तुषार ने गिटार निकाला, वही गाना बजाया जिसे प्रिया पसंद करती थी —
“तू जो मिला, तो हो गया सब हासिल…”

आँखों में नमी थी, लेकिन दिलों में सुकून।

अगली सुबह, तुषार ने प्रिया को स्टेशन तक छोड़ने की पेशकश की। लेकिन इस बार, प्रिया ने उसका हाथ थाम लिया।

“इस बार जाने नहीं दूँगी,” उसने कहा।

“और मैं जाने नहीं दूँगा,” तुषार ने जवाब दिया।

एक कैफे की खिड़की के पास, जहाँ पहले तुषार अकेला बैठा करता था, अब दो कॉफी के मग थे। किताब अब भी मेज़ पर थी, लेकिन उसके पन्नों के बीच प्रिया का मुस्कुराता चेहरा झांक रहा था।

मुंबई फिर से भीग रही थी — और इस बार, दो दिलों की कहानी अधूरी नहीं रही।

“कभी-कभी, प्यार लौट आता है — जब हम खुद से हार मान लेते हैं, और वक्त से नहीं।”

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